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Meet the Artist - Aparna Pathak Madhubani Art

 


अपर्णा पाठक 

अर्पणा पाठक

मिथिला चित्रकला कलाकार | शोधकर्ता | लोककला दस्तावेज़कार

मधुबनी (मिथिला) की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी अर्पणा पाठक पिछले कई वर्षों से मिथिला चित्रकला के संरक्षण, शोध, दस्तावेज़ीकरण और सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इनके लिए मिथिला चित्रकला केवल एक कला नहीं, बल्कि लोकजीवन, संस्कृति और विरासत को जीवित रखने का माध्यम है। प्रत्येक कलाकृति पारंपरिक शैली, लोक प्रतीकों और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर हस्तनिर्मित की जाती है।

इनका उद्देश्य केवल चित्र बनाना नहीं, बल्कि लोक कलाकारों को सम्मानजनक आजीविका और उनकी कला को उचित पहचान दिलाना भी है।

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  • जानिए अर्पणा पाठक की यात्रा के बारे में 

    मिथिला चित्रकला : परंपरा, पहचान और आजीविका




    कलाकार – अर्पणा पाठक

    कुछ कलाएँ सीखी जाती हैं, कुछ विरासत में मिलती हैं। मिथिला चित्रकला मेरे लिए केवल एक कला नहीं, बल्कि विरासत, साधना और समाज के प्रति मेरी जिम्मेदारी है। इस कला ने मुझे केवल चित्र बनाना नहीं सिखाया, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझना, लोकजीवन को पढ़ना और कलाकारों के संघर्ष को महसूस करना भी सिखाया। यही कारण है कि मिथिला चित्रकला मेरे लिए अध्ययन का विषय मात्र नहीं, बल्कि जीवन की निरंतर चलने वाली एक यात्रा है।

    मिथिला केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है। इस भूमि की मिट्टी में इतिहास की स्मृतियाँ हैं, लोकजीवन में परंपराओं की गरिमा है और प्रत्येक आँगन में सृजन की सहज लय स्पंदित होती है। यहाँ कला किसी विशेष अवसर की वस्तु नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। जन्म से लेकर विवाह, पर्व-त्योहारों से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक, जीवन के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण अवसर पर कला अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।

    भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। देश के प्रत्येक क्षेत्र ने अपनी विशिष्ट लोककलाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है। इन्हीं लोककलाओं में मिथिला चित्रकला का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। अपनी सूक्ष्म रेखाओं, सशक्त प्रतीकों, प्राकृतिक रंगों और गहन सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के कारण यह कला आज विश्वभर में सम्मानपूर्वक पहचानी जाती है। किंतु इसकी वास्तविक शक्ति इसकी लोकप्रियता में नहीं, बल्कि उस लोकजीवन में निहित है जिसने इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है।

    लोकमान्यता है कि मिथिला चित्रकला की परंपरा का संबंध रामायण काल से जुड़ा है। कहा जाता है कि राजा जनक ने सीता और भगवान राम के विवाह के अवसर पर जनकपुर को चित्रों से सजाने का आदेश दिया था और उसी परंपरा से इस कला का विकास हुआ। यद्यपि इस संबंध में प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी यह कथा मिथिला की सांस्कृतिक स्मृति और लोकविश्वास का अभिन्न अंग है। समय के साथ यह कला घरों की दीवारों से निकलकर कागज़, वस्त्र और कैनवास तक पहुँची तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने में सफल हुई।

    किन्तु मेरे लिए मिथिला चित्रकला की सबसे बड़ी पहचान उसकी वैश्विक प्रसिद्धि नहीं, बल्कि उसकी जीवंत सांस्कृतिक परंपरा है। यह कला आज भी ग्रामीण जीवन की धड़कनों के साथ जुड़ी हुई है। इसकी प्रत्येक रेखा, प्रत्येक आकृति और प्रत्येक रंग लोकजीवन की किसी न किसी स्मृति, आस्था अथवा अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि मिथिला चित्रकला को समझना केवल उसके चित्रों को देख लेना नहीं है; इसके लिए उस समाज को समझना आवश्यक है जहाँ यह कला जन्मी, विकसित हुई और आज भी साँस ले रही है।

     

    मेरी यात्रा और मिथिला चित्रकला से जुड़ाव

    मेरा जन्म मधुबनी जिले के ऐतिहासिक नगर राजनगर में हुआ। यह मेरे जीवन का सौभाग्य है कि मेरा बचपन ऐसे सांस्कृतिक परिवेश में बीता, जहाँ कला किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि घर-आँगन की सहज अभिव्यक्ति थी। बचपन से ही मैंने अरीपन बनते देखा, विवाह के अवसर पर कोहबर सजते देखा और त्योहारों पर घरों की दीवारों को रंगों से जीवंत होते देखा। उस समय शायद मैं यह नहीं समझती थी कि जिन चित्रों को मैं प्रतिदिन देख रही हूँ, वे विश्व की सबसे महत्वपूर्ण लोकचित्र परंपराओं में से एक हैं। मेरे लिए वे केवल अपने घर, अपने गाँव और अपनी संस्कृति का स्वाभाविक हिस्सा थे।

    समय के साथ यह अनुभव मेरी संवेदनाओं का आधार बनता गया। मुझे महसूस होने लगा कि मिथिला चित्रकला केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि लोकजीवन की स्मृतियों, आस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों की दृश्य अभिव्यक्ति है। यही वह बिंदु था जहाँ इस कला से मेरा संबंध दर्शक का नहीं, बल्कि साधक का बनने लगा।

    यद्यपि मेरी शिक्षा-दीक्षा बेगूसराय में सम्पन्न हुई, परंतु मन सदैव मिथिला की उसी सांस्कृतिक भूमि से जुड़ा रहा। जहाँ भी रही, मिथिला की स्मृतियाँ मेरे साथ रहीं। मिट्टी की सोंधी गंध, लोकगीतों की धुन, त्योहारों की रौनक और रंगों से सजी दीवारें मेरे भीतर लगातार जीवित रहीं। मुझे धीरे-धीरे यह एहसास हुआ कि मेरी सांस्कृतिक पहचान का सबसे सशक्त आधार यही लोकपरंपरा है।

    कुछ वर्षों बाद पुनः राजनगर लौटने का अवसर मिला। यह लौटना केवल अपने गाँव लौटना नहीं था, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना था। यहीं से मैंने मिथिला चित्रकला के अध्ययन, संरक्षण, दस्तावेज़ीकरण और सृजन को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। पिछले कई वर्षों से मैं इसी दिशा में कार्य कर रही हूँ। मेरा प्रयास केवल चित्र बनाना नहीं रहा, बल्कि इस कला के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पक्षों को समझना भी रहा है।

    धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि किसी भी लोककला को समझने का सबसे विश्वसनीय माध्यम उसके कलाकार होते हैं। इसलिए मैंने पुस्तकों के साथ-साथ कलाकारों के बीच जाकर सीखने का निर्णय लिया। यह निर्णय मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीखों में से एक सिद्ध हुआ। कलाकारों के बीच बिताया गया समय मुझे यह समझाने लगा कि मिथिला चित्रकला केवल एक चित्र शैली नहीं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक विरासत है, जिसे आज भी परिवारों और समुदायों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा गया है।

    इसी अनुभव ने मेरे भीतर शोध की जिज्ञासा को भी जन्म दिया। मैंने महसूस किया कि इस कला का संरक्षण केवल चित्रों के संरक्षण से संभव नहीं है। इसके लिए कलाकारों के जीवनानुभव, उनकी कार्यप्रणाली, पारंपरिक ज्ञान, लोकविश्वास और मौखिक इतिहास का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण भी उतना ही आवश्यक है। यही विचार आगे चलकर मेरे कार्य का आधार बना और मैंने स्वयं को केवल कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि इस जीवित सांस्कृतिक विरासत की एक संवेदनशील दस्तावेज़कार के रूप में भी देखना प्रारम्भ किया।

    आज जब मैं अपनी इस यात्रा पर पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो अनुभव करती हूँ कि मिथिला चित्रकला ने मुझे केवल एक कलाकार नहीं बनाया; उसने मुझे अपनी संस्कृति को समझने की दृष्टि, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध और लोककलाओं के संरक्षण के प्रति एक स्पष्ट प्रतिबद्धता भी दी। यही प्रतिबद्धता मेरी आगे की समस्त यात्रा का आधार है।

    लोकजीवन, परंपरा और कलाकारों के बीच मेरी शोध-यात्रा

    मिथिला चित्रकला को समझने के लिए केवल उसके चित्रों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। यह कला अपने कलाकारों, उनके परिवेश, लोकविश्वासों और सामुदायिक जीवन के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए मैंने अपने अध्ययन को पुस्तकों और अभिलेखों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन गाँवों की ओर रुख किया जहाँ यह परंपरा आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है।

    पिछले कई वर्षों में मुझे मधुबनी जिले तथा आसपास के अनेक कला-समृद्ध गाँवों—राजनगर, जितवारपुर, रांटी, सिमरी, फुलपरास तथा अन्य बस्तियों—का अनेक बार भ्रमण करने का अवसर मिला। इन यात्राओं का उद्देश्य केवल चित्रों का अवलोकन करना नहीं था, बल्कि कलाकारों के जीवन, उनकी कार्यशैली, पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक परिवेश को समझना था। प्रत्येक यात्रा मेरे लिए एक नए अनुभव और नई सीख का माध्यम बनी।

    इन गाँवों में पहुँचकर मैंने अनुभव किया कि मिथिला चित्रकला किसी एक कलाकार की निजी अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की सांस्कृतिक भाषा है। घरों के आँगन, मिट्टी से लीपी दीवारें, पूजा-स्थल, विवाह कक्ष और दैनिक जीवन की अनेक गतिविधियाँ इस कला से गहराई से जुड़ी हुई हैं। कई घरों में मैंने देखा कि दादी अपनी पोतियों को पारंपरिक रूपांकन सिखा रही थीं, तो कहीं माँ अपनी बेटियों के साथ बैठकर प्राकृतिक रंग तैयार कर रही थीं। उस समय मुझे यह अनुभव हुआ कि मिथिला चित्रकला की सबसे बड़ी पाठशाला कोई औपचारिक संस्थान नहीं, बल्कि स्वयं मिथिला का परिवार और समाज है।

    मिथिला में किसी भी शुभ अवसर की कल्पना अरीपन, कोहबर और भित्ति-चित्रों के बिना अधूरी मानी जाती है। अरीपन केवल भूमि पर बनाया गया अलंकरण नहीं, बल्कि शुभता और मंगल का प्रतीक है। कोहबर केवल विवाह-कक्ष की सजावट नहीं, बल्कि नवदंपति के सुख, समृद्धि और संतति की मंगलकामना का सांस्कृतिक दस्तावेज़ है। इसी प्रकार देवी-देवताओं, सूर्य, चंद्रमा, तुलसी, मछली, कमल, बाँस और अन्य प्रतीकों का चित्रण केवल कलात्मक सौंदर्य नहीं रचता, बल्कि लोकजीवन की मान्यताओं और जीवन-दर्शन को भी अभिव्यक्त करता है।

    परंपरागत रूप से यह चित्रकला गोबर और मिट्टी से लीपी हुई दीवारों पर बनाई जाती रही है। रंगों की तैयारी भी पूरी तरह प्रकृति पर आधारित होती थी—हल्दी से पीला, काजल से काला, पत्तियों से हरा, पलाश और अन्य पुष्पों से लाल एवं नारंगी तथा चावल के घोल से सफेद रंग तैयार किए जाते थे। इन प्राकृतिक रंगों में केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ संतुलित जीवन-दृष्टि भी निहित है। आज जब विश्व टिकाऊ (Sustainable) जीवन-शैली की बात कर रहा है, तब मिथिला चित्रकला की यह परंपरा हमें प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का महत्वपूर्ण संदेश देती है।

    इन यात्राओं के दौरान मुझे वरिष्ठ और युवा—दोनों पीढ़ियों के कलाकारों से विस्तृत संवाद करने का अवसर मिला। मैंने पाया कि अधिकांश कलाकारों के लिए चित्रकला केवल आय का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक विरासत और आध्यात्मिक आस्था का अभिन्न अंग है। उनके लिए चित्र बनाना एक व्यवसाय से अधिक एक साधना है। प्रत्येक चित्र में वे केवल रंग नहीं भरते, बल्कि अपने अनुभव, अपनी स्मृतियाँ और अपनी सांस्कृतिक चेतना भी अभिव्यक्त करते हैं।

    कलाकारों के साथ बिताए गए समय ने मुझे यह भी समझाया कि लोककला का वास्तविक मूल्य उसके बाज़ार मूल्य से कहीं अधिक होता है। एक चित्र के पीछे वर्षों का अभ्यास, पीढ़ियों से संचित ज्ञान, लोककथाएँ, धार्मिक विश्वास और जीवनानुभव छिपे होते हैं। यही कारण है कि मिथिला चित्रकला को केवल एक कलाकृति के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखा जाना चाहिए।

    इसी शोध-यात्रा के दौरान मुझे मधुबनी शिल्पसंघ, ग्राम विकास परिषद, मधुबनी तथा मिथिला चित्रकला के संरक्षण और संवर्धन से जुड़ी अन्य संस्थाओं के साथ कार्य करने का अवसर मिला। इन संस्थाओं के माध्यम से मैंने समझा कि किसी भी लोककला का संरक्षण केवल कलाकारों के प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए संस्थागत सहयोग, दस्तावेज़ीकरण, प्रशिक्षण, शोध और बाज़ार—सभी की समान रूप से आवश्यकता होती है।

    इस क्रम में मुझे मिथिला चित्रकला के अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों—पद्मश्री सीता देवी, पद्मश्री जगदम्बा देवी, पद्मश्री बउआ देवी, गोदावरी दत्ता, दुलारी देवी, महालक्ष्मी करन, संतोष कुमार दास, शांतनु दास, उर्मिला देवी, कर्पूरी देवी, कृष्णानंद झा तथा मिथलेश झासे मिलने और उनके कार्यों का अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन कलाकारों के साथ हुए संवादों ने मुझे यह समझाया कि उत्कृष्ट कला केवल तकनीकी कौशल का परिणाम नहीं होती, बल्कि उसके पीछे वर्षों की साधना, अनुशासन, धैर्य और अपनी संस्कृति के प्रति गहरा समर्पण होता है।

    इन महान कलाकारों की कला ने मिथिला चित्रकला को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है। उनके चित्रों में मिथिला का लोकजीवन, प्रकृति, स्त्री-अनुभव, धार्मिक आस्था और सामाजिक संवेदनाएँ अत्यंत सशक्त रूप में अभिव्यक्त होती हैं। उनके साथ बिताया गया समय मेरे लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण से कम नहीं था। मैंने उनसे केवल चित्र बनाना नहीं सीखा, बल्कि यह भी सीखा कि लोककला का संरक्षण तभी संभव है जब कलाकार अपनी परंपरा के प्रति आस्था और समाज के प्रति उत्तरदायित्व दोनों को साथ लेकर चले।

    इन सभी अनुभवों ने मेरे भीतर यह विश्वास और अधिक दृढ़ किया कि मिथिला चित्रकला केवल अतीत की धरोहर नहीं है। यह एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा है, जो आज भी समाज के भीतर निरंतर विकसित हो रही है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम इसे कलाकारों के जीवन, उनके ज्ञान और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ समझें और संरक्षित करें। यही सोच मेरे शोध, मेरे सृजन और मेरे सांस्कृतिक कार्यों की आधारशिला बनी।

    परंपरा से विश्व तक : संवाद, दस्तावेज़ीकरण और सांस्कृतिक दायित्व

    मिथिला चित्रकला की मेरी यात्रा केवल व्यक्तिगत अभ्यास या कलात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रही। समय के साथ यह यात्रा अध्ययन, दस्तावेज़ीकरण, जनसंवाद और सांस्कृतिक प्रसार की दिशा में भी विकसित हुई। मेरा विश्वास है कि किसी भी लोककला का संरक्षण केवल उसके चित्रों को सुरक्षित रखने से नहीं होता, बल्कि उसके ज्ञान, उसकी परंपराओं और उसके कलाकारों को समाज से निरंतर जोड़कर रखने से होता है।

    इसी उद्देश्य से मुझे मिथिला चित्रकला संस्थान, मधुबनी में शिक्षकों और विद्यार्थियों से संवाद करने का अवसर मिला। वहाँ यह देखकर प्रसन्नता हुई कि नई पीढ़ी इस लोककला को केवल सीख ही नहीं रही, बल्कि उसके इतिहास, प्रतीकों और सांस्कृतिक अर्थों को भी समझने का प्रयास कर रही है। मुझे यह अनुभव हुआ कि यदि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक कला-शिक्षा के बीच सार्थक संवाद स्थापित किया जाए, तो मिथिला चित्रकला आने वाले समय में और अधिक सशक्त रूप से विकसित हो सकती है।

    मधुबनी नगर तथा आसपास के सार्वजनिक स्थलों—विशेषकर रेलवे स्टेशन और विभिन्न सरकारी भवनों—पर निर्मित भित्ति-चित्रों का अध्ययन भी मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण अनुभव रहा। इन चित्रों ने यह सिद्ध किया कि लोककला अब केवल घरों की दीवारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सार्वजनिक जीवन और शहरी परिदृश्य का भी हिस्सा बन चुकी है। इससे न केवल इस कला की दृश्यता बढ़ी है, बल्कि आम नागरिकों का अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव भी मजबूत हुआ है। फिर भी मेरा मानना है कि किसी लोककला की वास्तविक शक्ति उसकी सार्वजनिक प्रदर्शनी से अधिक उसके मूल समुदाय में निहित होती है, जहाँ वह आज भी जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनी हुई है।

    मेरे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव वह रहा जब बोगनवेलिया आर्ट फाउंडेशन द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए आयोजित एक विशेष कार्यशाला में मुझे मिथिला चित्रकला की प्रतिनिधि कलाकार के रूप में आमंत्रित किया गया। यह मेरे लिए केवल एक कार्यशाला नहीं थी, बल्कि भारतीय लोकपरंपरा और युवा पीढ़ी के बीच संवाद स्थापित करने का एक सशक्त अवसर था।

    इस कार्यशाला में मैंने विद्यार्थियों को मिथिला चित्रकला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक महत्त्व, पारंपरिक शैली, प्राकृतिक रंगों की तैयारी, प्रतीकों की अर्थवत्ता तथा चित्रांकन की विधियों से परिचित कराया। व्यावहारिक प्रदर्शन के दौरान विद्यार्थियों ने स्वयं पारंपरिक रूपांकनों का अभ्यास किया। उनके प्रश्नों, जिज्ञासा और सीखने की उत्सुकता ने मुझे यह विश्वास दिलाया कि यदि लोककलाओं को सही संदर्भ और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो नई पीढ़ी उन्हें केवल एक 'क्राफ्ट' के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में स्वीकार करती है।

    उस कार्यशाला से लौटते समय मेरे मन में एक विचार बार-बार उभर रहा था—लोककलाओं का भविष्य केवल कलाकारों के हाथों में नहीं, बल्कि उन विद्यार्थियों और शोधार्थियों के हाथों में भी है जो उन्हें समझने, सीखने और आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। इसलिए मेरा प्रयास सदैव रहा है कि कला केवल प्रदर्शनियों तक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक संवाद का भी हिस्सा बने।

    मेरे जीवन का एक अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायी क्षण वह था, जब मुझे अपनी हस्तनिर्मित मिथिला चित्रकला प्रसिद्ध साहित्यकार और समाजसेवी सुधा मूर्ति जी को भेंट करने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने अत्यंत आत्मीयता के साथ उस कलाकृति को स्वीकार किया और मिथिला चित्रकला की सांस्कृतिक गरिमा तथा लोककलाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर अपने विचार व्यक्त किए। वह क्षण मेरे लिए केवल व्यक्तिगत सम्मान का विषय नहीं था, बल्कि इस विश्वास का भी प्रमाण था कि भारतीय लोककलाएँ आज भी समाज के संवेदनशील और जागरूक वर्ग के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

    इन सभी अनुभवों ने मुझे यह समझाया कि मिथिला चित्रकला केवल अतीत की धरोहर नहीं है। यह वर्तमान में सक्रिय एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा है, जो निरंतर नए संदर्भों से जुड़ रही है। विश्वविद्यालयों में शोध, सांस्कृतिक संस्थानों की पहल, सार्वजनिक स्थलों पर भित्ति-चित्र, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियाँ तथा युवा पीढ़ी की बढ़ती रुचि—ये सभी इस कला के उज्ज्वल भविष्य के संकेत हैं।

    फिर भी, इन उपलब्धियों के बीच एक प्रश्न लगातार मेरे मन को उद्वेलित करता रहा—क्या इस वैश्विक पहचान का वास्तविक लाभ उन कलाकारों तक पहुँच रहा है, जिन्होंने पीढ़ियों से इस परंपरा को जीवित रखा है? अनेक यात्राओं और कलाकारों से हुए संवादों के दौरान मैंने पाया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित होने के बावजूद अधिकांश ग्रामीण कलाकार आज भी आर्थिक असुरक्षा, सीमित बाज़ार और बिचौलियों पर निर्भरता जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यही अनुभव आगे चलकर मेरे चिंतन का सबसे महत्त्वपूर्ण विषय बना।

    मैंने महसूस किया कि यदि लोककला का संरक्षण केवल उसके सौंदर्य तक सीमित रह जाए और कलाकार सम्मानजनक जीवन से वंचित रहें, तो यह संरक्षण अधूरा होगा। इसलिए मेरे लिए मिथिला चित्रकला का प्रश्न केवल संस्कृति का प्रश्न नहीं है; यह आजीविका, गरिमा और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। इसी सोच ने मेरे कार्य को केवल कला-सृजन तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि कलाकारों के जीवन, उनके अधिकारों और उनके भविष्य की ओर भी उन्मुख किया।

    कला, बाज़ार और आजीविका : एक आवश्यक विमर्श

    आज मिथिला चित्रकला भारत की सीमाओं को पार कर विश्वभर में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुकी है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों, संग्रहालयों, निजी संग्रहों तथा कला बाज़ारों में इसकी निरंतर उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि यह लोककला वैश्विक कला-जगत में सम्मानपूर्वक स्वीकार की जा चुकी है। अनेक कलाकारों को राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं और उनकी कृतियाँ विश्व के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँची हैं। यह उपलब्धि निश्चय ही गौरव का विषय है।

    किन्तु अपने फील्ड अध्ययन और कलाकारों से हुए संवादों के दौरान मैंने एक गहरी विडंबना को निकट से देखा। जिस कला को विश्वभर में सराहा जा रहा है, उसके अनेक सर्जक आज भी आर्थिक असुरक्षा, सीमित संसाधनों और असंगठित बाज़ार व्यवस्था से जूझ रहे हैं। उनकी कला की प्रतिष्ठा बढ़ी है, परंतु उनके जीवन की परिस्थितियों में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया है।

    सबसे बड़ी चुनौती कलाकारों की प्रत्यक्ष बाज़ार तक पहुँच का अभाव है। अधिकांश ग्रामीण कलाकार अपनी कलाकृतियों का मूल्य स्वयं निर्धारित नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप वे बिचौलियों पर निर्भर हो जाते हैं, जो उनकी कृतियों को बहुत कम मूल्य पर खरीदकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कई गुना अधिक कीमत पर बेचते हैं। इस प्रक्रिया में कलाकार की सृजनशीलता का लाभ सबसे कम उसी तक पहुँचता है, जिसने उस कृति को जन्म दिया है।

    यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता का प्रश्न नहीं है; यह सांस्कृतिक न्याय का भी प्रश्न है। यदि किसी लोककला का वास्तविक सर्जक ही सम्मानजनक आजीविका से वंचित रह जाए, तो उस कला की समृद्धि अधूरी मानी जाएगी। लोककला का संरक्षण केवल पुरस्कारों, प्रदर्शनियों या संग्रहालयों तक सीमित नहीं रह सकता। उसका सबसे महत्त्वपूर्ण आधार कलाकार का सम्मान, उसकी आर्थिक सुरक्षा और उसके ज्ञान की सामाजिक स्वीकृति है।

    अपने अनुभवों के आधार पर मेरा मानना है कि इस दिशा में बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहले कलाकारों को बाज़ार से सीधे जोड़ने की पारदर्शी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। डिजिटल मंच निश्चित रूप से नई संभावनाएँ खोलते हैं, किंतु केवल डिजिटल पोर्टल उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। ग्रामीण कलाकारों को डिजिटल साक्षरता, ई–कॉमर्स, ऑनलाइन विपणन, मूल्य निर्धारण, पैकेजिंग, कॉपीराइट और ग्राहक संवाद जैसे विषयों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए। यदि प्रशिक्षण उनकी भाषा, स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप हो, तो वे अधिक आत्मविश्वास के साथ राष्ट्रीय और वैश्विक बाज़ार से जुड़ सकते हैं।

    इसके साथ ही कलाकारों के लिए स्थानीय स्तर पर सहायता एवं संसाधन केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए, जहाँ उन्हें डिज़ाइन नवाचार, दस्तावेज़ीकरण, विपणन, वित्तीय प्रबंधन और सरकारी योजनाओं की जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध हो। कला सहकारी समितियाँ, उत्पादक समूह और कलाकार-नेतृत्व वाले विपणन मंच भी इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। मेरा विश्वास है कि कलाकारों को केवल अनुदान नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने के अवसर दिए जाने चाहिए।

    मिथिला चित्रकला के संदर्भ में एक और पक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने में ग्रामीण महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। उन्होंने इस कला को केवल सुरक्षित ही नहीं रखा, बल्कि उसे अपनी दैनिक जीवन-शैली, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक परंपराओं का अभिन्न अंग बनाए रखा। आज भी बड़ी संख्या में महिला कलाकार अपने परिवार की आर्थिक संरचना में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इसलिए मिथिला चित्रकला का सशक्तिकरण वस्तुतः ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण से भी जुड़ा हुआ है।

     

    मेरा दृष्टिकोण : संरक्षण से सशक्तिकरण तक

    मेरे लिए मिथिला चित्रकला केवल चित्रांकन की एक विधा नहीं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक विरासत है, जिसकी रक्षा केवल उसके रूपों को सुरक्षित रखकर नहीं की जा सकती। इसके लिए कलाकारों के ज्ञान, अनुभव, जीवन-संघर्ष और सांस्कृतिक स्मृतियों का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण भी उतना ही आवश्यक है। मेरा प्रयास इसी दिशा में कार्य करने का रहा है और भविष्य में भी रहेगा।

    मैं ऐसी पहल विकसित करना चाहती हूँ जिसमें कला, शोध, दस्तावेज़ीकरण, प्रशिक्षण और आजीविका—इन सभी को एक साथ जोड़ा जा सके। मेरा विश्वास है कि यदि कलाकारों को सम्मानजनक बाज़ार, संस्थागत सहयोग, नई पीढ़ी तक पहुँच और अपनी कला का उचित मूल्य प्राप्त हो, तो मिथिला चित्रकला केवल एक सांस्कृतिक धरोहर नहीं रहेगी, बल्कि ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण का एक प्रभावी मॉडल बन सकती है।

    आने वाले समय में मेरा उद्देश्य केवल स्वयं चित्र बनाना नहीं है, बल्कि इस लोकपरंपरा के कलाकारों के मौखिक इतिहास, कार्यप्रणाली, पारंपरिक तकनीकों और सांस्कृतिक ज्ञान का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण करना भी है। मैं चाहती हूँ कि भविष्य की पीढ़ियाँ केवल चित्रों को ही न देखें, बल्कि उन कलाकारों की जीवन-यात्रा को भी जानें, जिन्होंने अपने श्रम, संवेदना और सृजनशीलता से इस परंपरा को जीवित रखा।

     

    निष्कर्ष

    जब मैं अपनी पूरी यात्रा पर दृष्टि डालती हूँ, तो अनुभव करती हूँ कि मिथिला चित्रकला ने मुझे केवल एक कलाकार नहीं बनाया; उसने मुझे अपनी संस्कृति को समझने की दृष्टि, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध और लोककलाओं के संरक्षण के प्रति आजीवन प्रतिबद्धता दी है।

    मेरा विश्वास है कि किसी भी लोककला का भविष्य केवल संग्रहालयों में सुरक्षित चित्रों से नहीं, बल्कि उन कलाकारों से निर्धारित होता है जो उसे अपने श्रम, अपने विश्वास और अपनी स्मृतियों से जीवित रखते हैं। यदि हम उनके ज्ञान का सम्मान करें, उनकी कला का उचित मूल्य सुनिश्चित करें और उन्हें गरिमापूर्ण आजीविका उपलब्ध कराएँ, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत वास्तव में सुरक्षित रह सकेगी।

    मेरे लिए मिथिला चित्रकला अतीत की स्मृति भर नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। मैं इस परंपरा को केवल संरक्षित होते हुए नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होते हुए देखना चाहती हूँ—ऐसी परंपरा के रूप में, जो अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखते हुए कलाकारों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं, के लिए सम्मान, आत्मनिर्भरता और नए अवसरों का आधार बने।

    इसी विश्वास के साथ मैं अपनी कला, अपने शोध और अपने सामाजिक दायित्व को एक साझा उद्देश्य के रूप में आगे बढ़ाना चाहती हूँ, ताकि मिथिला चित्रकला आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल विरासत न रहे, बल्कि प्रेरणा, पहचान और सम्मानजनक आजीविका का सशक्त माध्यम भी बने।

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